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1.1 हिंदी भाषा का परिचय

किसी भी भाषा का अध्ययन चार इकाइयों के स्तर पर किया जा सकता है -

1. ध्वनि व्यवस्था

2. शब्द व्यवस्था

3. व्याकरणिक संरचना

4. लिपि व वर्तनी

 

हिंदी भाषा की ध्वनि व्यवस्था :-

    हिंदी भाषा में कुल 59 ध्वनियाँ स्वीकार की गई हैं इस दृष्टि से हिंदी दुनिया की सर्वाधिक समृद्ध भाषाओं में से एक है। विश्व को सभी भाषाओं में प्रचलित प्रायः सभी ध्वनियाँ इसमें विद्यमान हैं। इन ध्वनियों को मूल रूप से तीन वर्गों में बाँटा जा सकता है :-

 (क) स्वर

 (ख) व्यंजन

 (ग) अयोगवाह ध्वनियाँ

 

(क) स्वर :-

      स्वर उस ध्वनि को कहते हैं जिसका उच्चारण बिना किसी अन्य ध्वनि को सहायता के होता है। हिंदी भाषा में बारह स्वर हैं जिन्हें तीन वर्गों में विभाजित, किया जा सकता है :-

(अ) मूल स्वर अर्थात् वे स्वर जिनका कोई विभाजन नहीं हो सकता। ये संख्या में चार हैं- अ, इ. उ, ऋ।

(आ) दीर्घ स्वर अर्थात् एक ही मूल स्वर के दो बार जुड़ने से बनने वाले स्वर। ये भी संख्या में चार हैं।–

     आ (अ + अ)

     ई (इ + इ)

     ऊ ( उ + उ )

     ऋ (ऋ + ऋ)

 (इ) संयुक्त स्वर अर्थात् वे दीर्घ स्वर जो दो अलग-अलग स्वरों से मिलकर बने हों। ये भी संख्या में चार हैं :-

     ए (अ + इ)

     ऐ (अ + ए)

     ओ (अ + उ)

     औ (अ + ओ)

 

 (ख) व्यंजन :-

   व्यंजन वे ध्वनियाँ हैं जिनके उच्चारण के लिए किसी अन्य ध्वनि (स्वर) की सहायता लेनी पड़ती है। स्वर के बिना व्यंजन पूर्ण नहीं होते। हिंदी में कुल 45 व्यंजन हैं जिनका कई आधारों पर वर्गीकरण किया जा सकता है

 

1. अवरोध के आधार पर व्यंजनों के भेद इस आधार पर व्यंजनों के तीन भेद किये जाते हैं अंतस्थ, ऊष्म व स्पर्श।

 

(अ) अंतस्थ व्यंजन :-

         ये वे व्यंजन हैं जिनका उच्चारण स्वर और व्यंजन का मध्यवर्ती होता है। इन व्यंजनों में श्वास का अवरोध बहुत कम होता है। ऐसे व्यंजन चार हैं य, र, ल, व। य और व में यह प्रवृत्ति अधिक है। इस विशेष योग्यता के कारण इन दोनों को ‘अर्धस्वर’ भी कहा जाता है।

 

(आ) ऊष्म या संघर्षी व्यंजन :-

     ये वे व्यंजन हैं जिनके उच्चारण में विशेष रूप से श्वास का घर्षण होता है। वस्तुतः, जीभ तथा होठों के निकट आने के कारण इसका उच्चारण में वायु रगड़ खाती हुई बाहर निकलती है व इसी से संघर्ष/घर्षण होता है। ये संख्या में चार हैं- श, ष, स, ह।

(इ) स्पर्श व्यंजन :- ये वे व्यंजन हैं जिनके उच्चारण में जीभ या निचला होठ उच्चारण स्थान का स्पर्श करके वायु को रोकता है। इन व्यंजनों को उच्चारण स्थान के आधार पर पाँच वर्गों में पांच-पांच की संख्या में बांटा गया है

कवर्ग :- क ख ग घ ड़

चवर्ग :- च छ ज झ ज्ञ

टवर्ग :- ट ठ ड ढ ण

तवर्ग : त थ द ध न

पवर्ग : प फ ब भ म

       ऊपर दिए गए तेंतीस व्यंजन हिंदी में मूल रूप से स्वीकार किए गए हैं किंतु विकास की प्रक्रिया में आठ और व्यंजन भी हिंदी में स्वीकृत हुए हैं। इनकी सूची स्रोतों के साथ इस प्रकार है

 

मराठी से : ळ

     फारसी से : क ख ग ज फ (नुक्ते के साथ)

     अपभ्रंश से : ड ढ

   इन इक्तालीस व्यंजनों के अतिरिक्त हिंदी में चार संयुक्त व्यंजन स्वीकृत हैं- क्ष, त्र, ज्ञ श्र। इस प्रकार कुल पैंतालीस व्यंजन हिन्दी भाषा में स्वीकार किए गए हैं।

 

2. उच्चारण स्थान के आधार पर व्यंजनों का वर्गीकरण :-

 कंठ्य - क, ख, ग, घ, इ, ह (:)

 तालव्य - च, छ, ज, झ, ज, य श

 मूर्धन्य - ट, ठ, ड. ढ, ण, ड (नुक्ते के साथ ), ढ. र, ष

 दंत्य - त, थ, द. ध, न, ल, स

 ओष्ठ्य - प, फ, ब, भ, म, व

 

3. व्यंजनों के अन्य वर्गीकरण :-

     व्यंजनों को कुछ और आधारों पर भी वर्गीकृत किया जाता है। ऐसे तीन वर्गीकरण प्रमुख हैं।

 (अ) अल्पप्राण व महाप्राण व्यंजन

 (आ) अघोष व सघोष व्यंजन

 (इ) संयुक्त व्यंजन

 

(अ) अल्पप्राण तथा महाप्राण व्यंजनों का अंतर उच्चारण में खर्च होने वाले श्वास की मात्रा पर आधारित है। अल्पाप्राण व्यंजन वे व्यंजन हैं जिनमें ऊर्जा, श्वास या वायु की मात्रा कम खर्च होती है जबकि महाप्राण व्यंजन वे व्यंजन हैं जिनमें ज्यादा ऊर्जा, श्वास या वायु खर्च होती है। एक सामान्य नियम यह भी है कि प्रायः अल्पप्राण ध्वनियों में ह जोड़ दिया जाए तो वे महाप्राण बन जाती हैं, जैसे –

 क् + ह = ख

 ग् + ह = घ्

   हिंदी के वर्गीय व्यंजनों में पहले, तीसरे और पांचवे व्यंजन-1 अल्पप्राण होते हैं तथा दूसरे व चौथे व्यंजन महाप्राण।

 

 (आ) अघोष और सघोष व्यंजन का मूल अंतर यह है कि सघोष व्यंजन के उच्चारण में स्वरतंत्री के अधिक कंपन के कारण आवाज काफी भारी होती है जबकि अघोष या व्यंजन में स्वरतंत्री कम कंपन के कारण आवाज़ अधिक भारी नहीं होती। हिंदी व्यंजनमाला में वर्गीय व्यंजनों में पहले दो व्यंजन अघोष व अंतिम तीन सघोष होते हैं।

 

(इ) संयुक्त व्यंजन: दो या दो से अधिक व्यंजनों के मेल से निर्मित होने वाले व्यंजनों का भी एक वर्ग है जिन्हें ‘संयुक्त व्यंजन’ कहते हैं। हिन्दी वर्णमाला में चार संयुक्त व्यंजन हैं-क्ष, त्र, ज्ञ तथा श्र , जिनकी निर्मिति इस प्रकार है

  क्ष -(क् + ष )

 ज्ञ – (ज् + )-| )

 श्र – (श् + र )

 त्र – (त् + र)

 

(ग) अयोगवाह ध्वनियाँ :-

          ये वे ध्वनियाँ हैं जो न स्वर हैं और न ही व्यंजन। ये स्वर इसलिए नहीं हैं कि इनकी स्वतंत्र गति नहीं है और व्यंजन इसलिए नहीं हैं कि ये स्वरों के बाद आती हैं, उनसे पहले नहीं आतीं। ऐसी तीन ध्वनियाँ हैं:

 

 1. अनुस्वार

 2. अनुनासिक

 3. विसर्ग

 

1. अनुस्वार :- अनुस्वार एक नासिक्य ध्वनि है। अनुस्वार का अर्थ है – अनु + स्वर, अर्थात् स्वर के बाद आने वाला, अर्थात् जो नासिक्य ध्वनियाँ स्वर के उच्चारण के बाद आती हैं जैसे गंगा (गङ्गा)। अनुस्वार के रूप में वर्गीय व्यंजनों के संदर्भ में नियम यह है कि अनुस्वार अपने से बाद में आने वाले व्यंजन के वर्ग का ही पाँचवा व्यंजन होगा। उदाहरण के लिए,

गंगा > गङ्गा

गंदा > गन्दा

खंभा > खम्भा

गंजा > ग)-जा

 

2. अनुनासिक :- वह नासिक्य ध्वनि जो स्वर के साथ जोड़कर बोली जाती है। इसके संकेत के रूप में अ आ के साथ चंद्रबिंदु तथा ए व ओ की मात्रा के साथ बिंदु का प्रयोग किया जाता है, जैसे – बाँस, जोंक।

 

3. विसर्गः यह वह ध्वनि है जो कुछ तत्सम शब्दों में स्वर के बाद ‘ह’ रूप में उच्चरित होती है, जैसे दुःख, छः, प्रायः, अत: आदि। यहाँ यह ध्यान रखना आवश्यक है कि वर्णमाला में अनुस्वार और अनुनासिक ध्वनियों की गणना एक ध्वनि के रूप में ही की जाती है। इस प्रकार अयोगवाह ध्वनियाँ दो ही बचती हैं।

 

इस प्रकार हमने देखा कि हिन्दी वर्णमाला में कुल बारह स्वर हैं, पैंतालीस व्यंजन हैं तथा दो अयोगवाह ध्वनियाँ हैं। ये सभी ध्वनियाँ परस्पर मिलकर उनसठ ही जाती हैं।

 

हिंदी की शब्द व्यवस्था तथा शब्द-संपदा

1. शब्द का अर्थ तथा वर्गीकरण :- शब्द ध्वनियों के उस समूह को कहते हैं जिसका कोई विशेष अर्थ हो।

    किसी भी विकसित या प्रगतिशील भाषा की मूल विशेषता यह होती है कि उसमें विविध प्रकार के शब्द जुड़ते जाते हैं तथा वह अधिक से अधिक भौगोलिक क्षेत्रों तथा संदर्भों के लिए प्रयुक्त होने लगती है। भाषा में किस-किस प्रकार के शब्द हैं तथा प्रायः वे किस अनुपात में हैं – इन तथ्यों के माध्यम से उस भाषा के विकास के स्तर तथा स्वरूप आदि के संबंध में विश्लेषण किया जा सकता है।

   हिन्दी की शब्द संपदा का वर्गीकरण विभिन्न आधारों पर किया जा सकता है। ऐसे प्रमुख आधार निम्नलिखित हैं –

(क) स्रोत की दृष्टि से

(ख) निर्माण या गठन की दृष्टि से

(ग) प्रयोग के संदर्भ की दृष्टि से

(घ) परिवर्तनशीलता या परिवर्तनीयता की दृष्टि से।

  हम इन सभी आधारों पर हिन्दी शब्दावली को वर्गीकृत कर सकते हैं। इन सभी वर्गीकरणों का क्रमशः विश्लेषण करते हुए हमें यह देखना चाहिये कि वे वर्गीकरण भाषा के स्वरूप की दृष्टि से कितने उचित हैं।

 

(क) स्रोत की दृष्टि से शब्द भंडार :-

     स्रोत की दृष्टि से शब्द भंडार के विश्लेषण का अर्थ है कि विभिन्न शब्द भाषा में किस प्रक्रिया से शामिल हुए हैं। हिन्दी के शब्द भंडार को स्रोत की से प्राय: चार भागों में बाँटा जाता है

1. तत्सम शब्द :-

       ‘तत्सम’ अर्थात् तत् (उस के) + सम (समान)। यहाँ ‘उस” का तात्पर्य है ‘संस्कृत’। तत्सम शब्द वे शब्द हैं जो संस्कृत से लिए गए हैं, और ठीक उसी रूप में लिये गए हैं जैसे वे मिलते थे। हिन्दी चूकि संस्कृत से ही विकसित हुई भाषा है, अतः स्वाभाविक रूप से संस्कृत शब्द हिन्दी के शब्द भंडार में काफी महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं।

तत्सम शब्द अपनी जटिलता के कारण प्रायः बोलचाल की भाषा में कम प्रयुक्त होते हैं और लिखित भाषा में अधिक। लिखित भाषा में भी जटिल वैचारिक अभिव्यक्तियों यथा निबंध, आलोचना में इनका प्रयोग अधिक होता है जबकि मानवीय अनुभवों तथा यथार्थ पर आधारित विधाओं यथा कहानी, उपन्यास में ये प्रायः कम मात्रा में मिलते हैं। कोई रचना यदि ऐतिहासिक प्रसंग को लेकर चलती है तो स्वाभाविक रूप से वातावरण निर्माण के उद्देश्य से तत्सम शब्दों का प्रयोग अधिक होने लगता है।

    सामाजिक वर्गीकरण की दृष्टि से देखें तो तत्सम शब्द प्रायः अभिजात वर्ग की भाषा में प्रयुक्त होते हैं। शब्द भी सामाजिक अंतरों को गहराई से व्यक्त करते हैं, इसके प्रमाण के रूप में तत्सम शब्दों के प्रयोक्ता वर्ग को देखा जा सकता है।

    कुछ तत्सम शब्द सरल प्रकृति के होते हैं, अत: वे समाज के एक बड़े हिस्से में प्रचलित हो जाते हैं, जैसे – अंग, उपकार. साधु, महात्मा, जल, कल, नेता, मंत्री इत्यादि। इसके विपरीत कुछ तत्सम शब्द अति जटिल प्रकृति के होते हैं और समाज के सुशिक्षित वर्ग के लोग ही इनका प्रयोग कर पाते हैं. जैसे औषधालय द्विचक्रिका, वायुयान, अंतर्भूत बहिर्गमन इत्यादि।

     हिन्दी साहित्य के इतिहास में तत्सम शब्दों के प्रयोग की प्रवृत्ति मुख्यतः छायावादी काव्य में मिलती है। तुलसी की भाषा में तत्सम शब्द अवधी के प्रवाह में आते हैं तो प्रयोगवादी काव्य में तत्सम शब्द कई विजातीय शब्दों के साथ आते हैं। तत्सम शब्दों के आधार पर रचित गद्य साहित्य में शुक्ल जी के निबंधों को; आचार्य द्विवेदी व अन्य लेखकों के ऐतिहासिक-पौराणिक उपन्यासों (जैसे बाणभट्ट की आत्मकथा) तथा नाटकों और सैद्धांतिक आलोचना को महत्वपूर्ण रूप में रखा जा सकता है। तत्सम शब्दों की अधिकता से निर्मित होने वाली भाषा पद्धति का उदाहरण इस प्रकार है

 

“हिमाद्रि तुंग शृंग से प्रबुद्ध शुद्ध भारती, स्वयंप्रभा समुज्ज्वला स्वतंत्रता पुकारती”

 

2.तद्भव शब्द :-

     तद्भव का अर्थ है तत् (उससे) + भव (निर्मित)। इसका अर्थ हुआ है कि जो शब्द संस्कृत के समान तो नहीं हैं, पर संस्कृत से ही निर्मित हैं, उन्हें तद्भव शब्द कहा जाता है। भाषा के विकास की परंपरा में शब्दों की प्रकृति निरंतर परिवर्तित होती रहती है। संस्कृत के जो शब्द समय के साथ कुछ परिवर्तित होकर हिन्दी भाषा में आ गए हैं, वे ही तद्भव शब्द कहलाते हैं। ऐसे शब्दों के उदाहरण हैं

  संस्कृत      >     हिन्दी

उच्च   > ऊँचा

ओष्ठ    > ओठ

धूम्र    > धुआँ

दुर्बल    > दुबला

क्षीर    > खीर

बधिर  > बहरा

 

    तद्भव शब्द हिन्दी के शब्द भंडार में सबसे अधिक महत्वपूर्ण है। हिन्दी संस्कृत से ही निर्मित पर उससे अलग भाषा है। तदभव शब्द इस रूप में हिन्दी के हिन्दीपन को पूर्णतः धारण करते हैं क्योंकि वे भी संस्कृत से ही निर्मित पर इससे अलग शब्द हैं। संस्कृत से हिन्दी तक के भाषिक विकास की ‘सरलीकरण’ की जिस परंपरा के रूप में विश्लेषित किया जाता है, तद्भव शब्द उसी परंपरा के आधार स्तंभ हैं।

     तद्भव शब्दों का प्रयोग प्राय: लोक अनुभवों में आने वाले तथ्यों, विचारों, घटनाओं तथा वस्तुओं आदि के लिए किया जाता है। स्वाभाविक रूप से ये शब्द मूलतः समाज के उस वर्ग से संबंधित होते हैं जो वर्ग शैक्षिक तथा आर्थिक दृष्टि से साधारण होता है। यह वर्ग जटिल भाषा का सरलीकरण करता रहता है क्योंकि भाषा का महत्व इनकी दृष्टि में सामान्य मानवीय अनुभवों को व्यक्त करना मात्र होता है, न कि जटिल सैद्धांविक चिंतन या विश्लेषण करना। साहित्यिक परंपरा में भी वे शब्द उन रचनाकारों के साहित्य में ज्यादा आते हैं जो लोक-धर्म का पालन करते हैं तथा आम जनता को साहित्यिक रचना के केंद्र में रखते हैं। ऐसा ही एक उदाहरण इस प्रकार है :-

“गोरख जगायो जोग, भति भगायो लोग

 

3. देशज शब्द :-

     देशज शब्द वे शब्द हैं-जिनका जन्म देश में ही हुआ है। यहाँ देश को अर्थ भाषा के अपने क्षेत्र से है। ये वे शब्द हैं जो लोक-परंपरा में ही पैदा हुए हैं। देशज शब्द प्रायः ध्वन्यात्मक होते हैं-तथा-ध्वनि के अनुकरण में हो बन जाते हैं। इनके कुछ उदाहरण इस प्रकार हैं- खर्राटा, भोंपू, हिनहिनाना, चिड़चिड़ाना, किलकारी इत्यादि।

    देशज शब्दों और तत्सम शब्दों की प्रकृति में एक बात समान है। ये दोनों ही परंपराएं वर्ग-विशेष से संबंधित होने के कारण संपूर्ण समाज के लिए सुबोध नहीं होतीं। तत्सम शब्द सामाजिक रूप से एक वर्ग विशेष (अभिजात वर्ग) की भाषा में प्रयुक्त होते हैं जबकि देशज शब्द भौगोलिक रूप से एक वर्ग विशेष ( स्थान/प्रदेश ) की भाषा में प्रयुक्त होते हैं।

 

देशज शब्दों की मूल विशेषता यह मानी गई है कि उनमें किसी अंचल की लोक-संस्कृति पूरी गहराई से व्यक्त होती है। किसी भी संस्कृति के विशेष तत्व प्रायः देशज भाषा का निर्माण करते हैं क्योंकि वे शब्द अन्य संस्कृतियों के लिए समान अर्थ में प्रयुक्त होने की क्षमता नहीं रखते। ये शब्द आयः ध्वन्यात्मक तो होते ही हैं, अर्थ-व्यंजकता भी इनमें गजब की होती है। साहित्य में इनका सर्वश्रेष्ठ प्रयोग उन रचनाओं में होता है जो किसी विशेष क्षेत्र या अंचल से संबंधित होती हैं उदाहरण के लिए, हिन्दी साहित्य में ‘मैला आँचल’ एक महत्वपूर्ण आंचलिक उपन्यास है जो बिहार के एक पिछड़े गाँव के जीवन को संपूर्णता में प्रदर्शित करता है। इस उपन्यास में स्वाभाविक रूप से देशज भाषा का प्रयोग काफी अत्यधिक मात्रा में  हुआ है। उदाहरण के लिए :-

"टन-टाँग! घड़ी घंटी बजाता है। 

तिन्न तिरकट-विन्ना। चिन्ना धा-था चिन्ना!

आँ रे। काँचहि बाँस के खाट रे खटोलना 

आखैर मूज के रहे डोर।" 

 

4. विदेशज शब्द :- विदेशी शब्द वे हैं जो हमारे भाषा क्षेत्र में नहीं जन्मे हैं बल्कि सांस्कृतिक आदान-प्रदान की प्रक्रिया में हिन्दी भाषा में स्वीकार किए गए हैं।  विदेशी शब्द किसी भी भाषिक परंपरा में एक लंबे समय तक शुद्धतावादियों द्वारा 'अशुद्ध' माने जाते हैं किंतु धीरे-धीरे वे भाषा में शामिल हो जाते हैं। जब भी दो संस्कृतियाँ एक-दूसरे से मिलती हैं तो भाषिक संक्रमण होता है और इसी प्रक्रिया में शब्दों का भी आदान-प्रदान होता है।  विदेशी शब्दों को स्वीकृति प्राय: इसलिए मिलती है जो विशेष बातें उस संस्कृति की हैं, वे उन्हीं की भाषा में मिल सकती हैं, हमारी भाषा में नहीं। उदाहरण के लिए, गंगा या अमेजन जैसे संस्कृति या स्थान विशेष से संबद्ध शब्द किसी भी अन्य भाषा में विदेशी ही हो सकते हैं। कभी-कभी ऐसा भी होता है कि एक शब्द मूल भाषा में होता है, पर ज्यादा प्रचलन के कारण विदेशी शब्द देशज शब्द-को विस्थापित कर देते हैं । उदाहरण के लिए, 'डॉक्टर शब्द धीरे-धीरे 'चिकित्सक' का स्थान लेने लगा है।

हिन्दी में विदेशी शब्द मूलतः दो परंपराओं के हैं। एक परंपरा अरबी-फारसी की है तथा दूसरी यूरोपीय भाषाओं की। भारतीय समाज में मध्यकालीन संक्रमण की प्रक्रिया में अरबी-फारसी परंपरा के शब्द हिन्दी में आए तथा आधुनिक काल के संक्रमण में यूरोपीय शब्द तेजी से आने लगे। संक्रमण के इन दोनों युगों में कई-कई भाषाओं के शब्द हिन्दी ने स्वीकार किए जिनके उदाहरण निम्नलिखित हैं -  फारसी परंपरा :- 

फारसी - नापसंद, चश्मा, कुश्ती, सितार, सरकार, हज़ार, उम्मीद 

तुर्की :- कालीन, कैंची, बेगम, चेचक, तोप, बहादुर 

अरबी :- अजीव, अदालत, आदमी, शराब, दुकान, दुनिया 

 

यूरोपीय परंपरा -  अंग्रेजी कलक्टर, पेन्शन, ऑपरेशन, लैम्प, सूटकेस, साइकिल, स्कूटर 

फ्रेंच :-  कूपन, कारतूस 

पुर्तगाली - गमला, चाबी, नीलाम, बाल्टी, पादरी

 

अन्य एशियाई परंपराएँ:

जापानी – रिक्शा

चीनी - चाय, लीची

 

विदेशी शब्दों का साहित्यिक प्रयोग इस बात पर निर्भर करता है कि रचनाकार की सांस्कृतिक समझ कैसी है। जो रचनाकार भाषा और संस्कृति की व्यापकता और परिवर्तनशीलता में विश्वास रखता है, वह इन शब्दों का प्रयोग करता है परंतु जो रचनाकार सांस्कृतिक आदान-प्रदान को संकीर्ण नजरिये से देखता है, वह इनसे यथासंभव बचने का प्रयास करता है। दूसरी बात यह भी है कि प्राय: विदेशी भाषा विदेशी शासन के साथ आती है तथा राजभाषा और अभिजात वर्ग की भाषा बन जाने के कारण एक आभामंडल से युक्त हो जाती है। उदाहरण के लिए, अंग्रेजों के चले जाने के बाद भी सांस्कृतिक रूप से भारत स्वाधीन नहीं हो सका है क्योंकि अंग्रेजी भाषा और संस्कृति के सामने सामान्य भारतीय अपनी भाषा और संस्कृति को हीन समझता है। इन कारणों से विदेशी शब्दों का प्रयोग तेजी से बढ़ता है। ऐसी ही स्थिति भारतेंदु युग से पूर्व फारसी के प्रयोग को लेकर दिखाई देती है जहाँ राजा शिवप्रसाद सितारे हिंद ‘उर्दूपन’ से युक्त भाषा का प्रयोग कर रहे थे जबकि राजा लक्ष्मण सिंह भाषा को उर्दूपन’ से बचाने का प्रयास कर रहे थे।

 

साहित्य में विदेशी शब्दों का प्रयोग समर्थ रचनाकार उचित संदर्भों में इस प्रकार करते हैं कि वे शब्द विजातीय प्रतीत नहीं होते। उदाहरण के लिए, तुलसी ने राम के लिए जिस विशेषण का प्रयोग सर्वाधिक किया है, वह ‘गरीबनेवाज़’ है। फारसी परपरा का यह शब्द राम भक्तिधारा के विचारों से सामंजस्य कैसे विठाता है – यही तुलसी की काव्यकला है। प्रेमचंद के उपन्यासों में विदेशी शब्दों का आवश्यक प्रयोग हुआ है और प्रयोगवाद तथा नई कविता में तो विदेशी शब्दों को खुली छूट दे दी गई है । एक उदाहरण द्रष्टव्य है :-

“विचित्र प्रोसेशन

गंभीर क्विक मार्च

कलाबत्तूवाली काली जरीदार ड्रेस पहने

चमकदार बैंड-दल”  ( मुक्तिबोध -अँधेरे में )

 

समीक्षा :-

   स्रोत के आधार पर शब्द-संपदा का वर्गीकरण उपर्युक्त चार वर्गों में किया गया है। यह वर्गीकरण हिन्दी भाषाविज्ञान की परंपरा में रूढ़ हो चुका है, पर इसमें कुछ मूलभूत समस्याएँ हैं जिनकी ओर संकेत करना आवश्यक है –

 1. कुछ शब्द ऐसे भी हैं जो इनमें से किसी एक वर्ग शामिल नहीं होते। ये शब्द संकर शब्द होते हैं, जो प्रकार की परंपराओं के शब्दों के मिश्रित रूप होते ऐसे कुछ शब्दों के उदाहरण हैं –

  फैशनपरस्त (अंग्रेजी + फारसी)

  थानेदार (तद्भव + फारसी)

  मोटरगाड़ी (अंग्रेजी + तद्भव)

  लाजशरम (तद्भव  + फारसी)

 

ध्यातव्य है कि इन्हें सामान्यतः देशज शब्दों के अंतर्गत स्वीकार किया जा चुका है।

2. कुछ शब्द ऐसे हैं जिनकी पूरी व्याख्या इस वर्गीकरण से नहीं हो पाती। उदाहरण के लिए, अंग्रेजी से लिए गए शब्द दो प्रकार से प्रयुक्त हो सकते है एक, उसी रूप में जैसे ये अंग्रेजी में प्रयुक्त होते हैं, तथा दूसरे, मूल रूप से कुछ परिवर्तित रूप में। संस्कृत के साथ रूप-परिवर्तन होने पर हम उसका नया नामकरण करते हैं, किंतु अंग्रेजी या किसी अन्य विदेशी भाषा के शब्दों के दोनों प्रकार के प्रयोग ‘विदेशी’ शब्द के रूप में ही ग्रहण किए जाते हैं। ऐसी स्थिति में उन शब्दों को समान व्याख्या नहीं हो पाती जो विदेशी परंपरा से तो हैं, पर उनका रूप कुछ बदल गया है। उदाहरण के लिए

  एकेडमी (अंग्रेजी) > अकादमी (हिन्दी)

  मैडम (अंग्रेजी) > मादाम (हिंदी)

 

3. इस वर्गीकरण में देशी-विदेशी शब्दों का अंतर भाषा क्षेत्र के आधार पर किया गया है, न कि देशों की सीमाओं के आधार पर। इसका अर्थ यह हुआ कि पाकिस्तान में प्रयुक्त होने वाले शब्द हिंदी के नजदीक होने के कारण विदेशज नहीं माने जाएगे जबकि भारत के ही कुछ राज्यों जैसे तमिलनाडु या कर्नाटक में उत्पन्न होने वाले शब्द विदेशज माने जाएंगे। यहाँ भाषायी क्षेत्रों तथा राजनीतिक सीमाओं का अंतर्विरोध सामने आने लगता है।

 

 

(ख) निर्माण या गठन की दृष्टि से शब्द भंडार :-

     निर्माण या गठन की दृष्टि से शब्दों के तीन भेद किए जाते हैं- रूढ, यौगिक तथा योगरूढ़ शब्द।

 

रूढ़ शब्द

    ये वे शब्द हैं जिनकी ध्वनियों को अलग करके कोई अर्थ नहीं निकाला जा सकता या जिनकी व्युत्पत्ति ज्ञात न हो, जैसे हाथ, पेट, किताब इत्यादि।

 

यौगिक शब्द

     ये वे शब्द हैं जो दो या दो से अधिक रूढ़ शब्दों से मिलकर बनते हैं तथा जिनका अर्थ दोनों के अर्थ जुड़ने से निर्धारित होता है, जैसे पुस्तकालय, हथगोला, जलज इत्यादि।

 

योगरूढ़ शब्द

     ये ऐसे शब्द हैं जो संरचना की दृष्टि से यौगिक हैं किंतु जिनका अर्थ एक विशेष रूप में रूढ़ हो चुका है। उदाहरण के लिए पंकज शब्द का यौगिक दृष्टि से अर्थ होगा – कीचड़ में जन्म लेने वाला, किंतु इसका प्रचलित अर्थ है कमल, जो कि रूढ हो चुका है। इसी प्रकार नीलकंठ इत्यादि शब्द भी इसी प्रकार के हैं।

 

 

(ग) प्रयोग के संदर्भ की दृष्टि से शब्द भंडार

     प्रयोग क्षेत्र के आधार पर शब्दों की प्रायः सभी भागों में तीन भागों में विभाजित किया जाता है- सामान्य शब्द, पारिभाषिक शब्द तथा अर्ध-पारिभाषिक शब्द।

 

1. सामान्य शब्द :-

     सामान्य शब्द वे मैं जो सामान्य व्यवहार की भाषा में प्रयुक्त होते हैं। इन शब्दों का निश्चित और वस्तुनिष्ठ अर्थ होता आवश्यक नहीं होता है। संदर्भ के परिवर्तन के साथ ये शब्द अलग-अलग अर्थों में प्रयुक्त हो जाते हैं। इनके अतिरिक्त इतको संबंध में एक और विशेष बात यह भी है कि इनका अपने नजदीकी शब्दों से अंतर निश्चित नहीं होता है। इन दोनों पक्षों को इन उदाहरणों के माध्यम से समझ सकते हैं

  राम अच्छा लड़का है।

  अच्छा, मैं जाता हूँ।

  मैं अच्छा हूँ, आप कैसे हैं?

 

उपरोक्त तीनों वाक्यों में ‘अच्छा’ शब्द का प्रयोग हुआ है -किंतु तीनों संदर्भों में हो इसका अर्थ अलग-अलग है। पहले संदर्भ में इसका अर्थ एक चारित्रिक विशेषता के रूप में है. दूसरे संदर्भ में एक अलविदासूचक शब्द के रूप में है तथा तीसरे संदर्भ में शारीरिक स्वास्थ्य को सूचित करने के लिए आया है। एक ही शब्द का ऐसा बहुआयामी प्रयोग उसे सामान्य शब्द बनाता है।

 

अब हम इसी का एक और उदाहरण देखते हैं

  राम तथा सीता वनवास के लिए गए।

  राम व सीता वनवास के लिए गए।

  राम और सीता वनवास के लिए गए।

  राम एवम् सीता वनवास के लिए गए।

 

उपरोक्त वाक्यों में ‘तथा’, ‘ और’, ‘व’, ‘एवम्’, जैसे शब्द परस्पर पर्यायवाची बनकर आए है। भाषाविज्ञान की दृष्टि से कोई भी दो शब्द पूर्ण पर्यायवाची नहीं हो सकते। ये शब्द भी संदर्भो के साथ बदल सकते हैं, पर सामान्यतः यह देख सकते हैं कि इन शब्दों के अर्थों में कोई विशेष अंतर नहीं है। इसका अर्थ यह हुआ कि ये शब्द आमतौर पर एक दूसरे के स्थान पर प्रयुक्त हो सकते हैं। यह सामान्य शब्दों की ही दूसरी प्रवृत्ति है।

 

2. पारिभाषिक शब्द

     पारिभाषिक शब्द वे शब्द हैं जिनका अर्थ और संदर्भ पूर्णतः परिभाषित होता है। ये शब्द किसी खास संदर्भ में प्रयुक्त होते हैं और प्रयुक्ति के संदर्भ में इनका अर्थ एकदम निश्चित व वस्तुनिष्ठ होता है। प्रत्येक विषय या क्षेत्र के अपने पारिभाषिक शब्द होते हैं। इनके कुछ उदाहरण इस प्रकार हैं –

  अर्थशास्त्र - संपत्ति, आपूर्ति

  राजनीतिशास्त्र - सत्ता, प्राधिकार, गणतंत्र, नियम, अधिनियम

  दर्शनशास्त्र - रहस्यवाद, तत्वमीमांसा, ज्ञानमीमांसा

  इतिहास – सामंतवाद, राष्ट्रवाद, मनसबदारी, पूंजीवाद

  भौतिकी - बल, ऊर्जा, ध्वनि

 

2. अर्द्ध-पारिभाषिक शब्द :-

      ये वे शब्द हैं जो किसी संदर्भ में पारिभाषिक शब्द बन जाते हैं तो किसी अन्य संदर्भ में सामान्य शब्दों की तरह व्यवहार करते हैं। अतः जो शब्द संदर्भ बदल जाने से पारिभाषिक से सामान्य या सामान्य से पारिभाषिक में रूपांतरित हो जाए, उसे अर्ध-पारिभाषिक शब्द कहा जाएगा। उदाहरण के लिए -

“मेरा बल इस बात पर है कि तुम सफल हो सको।“

हसते-हँसते मेरे पेट में बल पड़ गए।“

“क्षेत्र जितना सीमित होगा, बल उतना ही अधिक होगा। “

    उपरोक्त उदाहरणों में पहले दो में ‘बल’ शब्द सामान्य शब्द के रूप में हैं जबकि तीसरे उदाहरण में यह शब्द पारिभाषिक रूप में हैं। इसी प्रकार एक और उदाहरण देखा जा सकता है

“मेरी मांग पूरी करो”

“मेरी मांग पूरी भरो”

  उपरोक्त उदाहरण में पहले वाक्य में मांग शब्द का पारिभाषिक प्रयोग है जबकि दूसरे वाक्य में सामान्य!

 

समीक्षा :-

   उपरोक्त वर्गीकरण में विशेष दोष नहीं हैं। इसकी एकमात्र समस्या यह है कि एक ही शब्द ऐसा भी हो सकता है जो कई क्षेत्रों में एक साथ पारिभाषिक शब्द के रूप में प्रयुक्त होता है। ऐसी स्थिति में यह तय करना कठिन हो जाता है कि वह शब्द मूलतः किस क्षेत्र से संबंधित है। उदाहरण के लिए

   “यह वस्तु किस धातु की-बनी है?”

   “धातु के माध्यम से क्रिया का ज्ञान होता है।“

  उपरोक्त दोनों वाक्यों में धातु शब्द का प्रयोग पारिभाषिक अर्थ में है पर पहला प्रयोग रसायनशास्त्र या भौतिकी के संदर्भ में है जबकि दूसरा भाषाविज्ञान के संदर्भ में। इन सीमाओं के बावजूद यह वर्गीकरण व्यावहारिक रूप से मान्य है।

 

 (घ) परिवर्तनीयता की दृष्टि से शब्द भंडार :-

     परिवर्तनीयता का अर्थ है परिवर्तित होने की क्षमता। इस दृष्टि से भाषा के सभी शब्दों को दो भागों में बाँट दिया जाता है – विकारी शब्द तथा अविकारी शब्द। अविकारी शब्द वे हैं जो हर स्थिति में समान बने रहते हैं। इसके विपरीत विकारी शब्द वे हैं जो काल, लिंग, वचन आदि के साथ परिवर्तित हो जाते हैं |

 

विकारी शब्द :-

     ये वे शब्द हैं जो लिंग, वचन या काल आदि के परिवर्तन से बदल जाते हैं। हिंदी में चार प्रकार के विकारी शब्द मिलते हैं। उन्हें तथा उनके परिवर्तनशील रूप को हम निम्नलिखित उदाहरणों से देख सकते हैं –

 

(अ) संज्ञा : लड़का, लड़के, लड़कियाँ इत्यादि।

(आ) विशेषण : काला काले, काली इत्यादि।

(इ) सर्वनाम : वह, वे, वही इत्यादि।

(ई) क्रिया : जाता है, जाते हैं, जाती है इत्यादि।

 

अविकारी शब्द :-

     ये वे शब्द हैं जो किसी भी स्थिति में परिवर्तित नहीं होते हैं। प्रत्येक लिंग, बचत तथा काल में इनकी एक सी संरचना बनी रहती है। अविकारी शब्द निम्नलिखित वर्गों में विभाजित किए गए हैं :

(अ) क्रियाविशेषण: ये वे विशेषण हैं जो संज्ञा की नहीं, क्रिया की विशेषता बताते हैं, जैसे- ‘धीरे चलना’ में ‘धीरे’ शब्द ‘चलना’ क्रिया का विशेषण है।

 

(आ) योजक या समुच्चयबोधक शब्दः ये वे शब्द है जो दो वाक्यों या उपवाक्यों या शब्दों को जोड़ते हैं. जैसे : और, तथा, या, किंतु इत्यादि।

(इ) सम्बन्धबोधक शब्दः ये वे शब्द हैं जो वस्तुओं या व्यक्तियों के आपसी सम्बन्धों को व्यक्त करते हैं, जैसे - के लिए’, ‘के बिना’ इत्यादि।

(ई) विस्मयादिबोधक शब्दः ये वे शब्द हैं जो विस्मय को प्रकट करने के लिए प्रयुक्त होते हैं, जैसे: अरे, उफ, वाह

     संक्षेप में, हिन्दी की शब्द-संपदा उपरोक्त शब्दों की ही ‘समष्टि या समग्रता है। हिन्दी की शब्द संपदा काफी विस्तृत है तथा तेजी से विकसित होते हुए उस बिंदु पर पहुँचने का प्रयास कर रही है जहाँ हिन्दी संपूर्ण भारत की राजभाषा बनकर राष्ट्रीय एकीकरण की सूत्रधार बन सके।

 

2. शब्द निर्माण की प्रमुख युक्तियाँ :-

     भाषा में कुछ ऐसी युक्तियाँ होती हैं जो खुद शब्द न होकर भी शब्दों के निर्माण में अति महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। ऐसी तीन युक्तियाँ प्रमुख हैं

(क) उपसर्ग

(ख) प्रत्यय

(ग) संधि और समास

 

(क) उपसर्ग :-

      ये शब्द नहीं, शब्दांश हैं जो किसी शब्द के पूर्व में जुड़कर अर्थ परिवर्तन कर देते हैं, जैसे – निराकार = निर् + आकार। इसमें ‘आकार’ शब्द के पूर्व में ‘निर’ उपसर्ग लगने से अर्थ का परिवर्तन हो गया है। ध्यातव्य है कि उपसर्ग स्वतः सार्थक नहीं होते, अतः इन्हें शब्द नहीं माना जा सकता किंतु इनका प्रभाव अर्थपूर्ण होता है।

 

हिंदी में उपसर्ग प्रायः तीन स्रोतों से आए हैं :- संस्कृत से, फारसी से एवं हिंदी में स्वत: विकसित उपसर्ग।

 

संस्कृत के उपसर्ग लगभग 22 हैं, जैसे – सम्, प्र. सत् इत्यादि। इनके उदाहरण इस प्रकार हैं –

 

सम् + उचित : समुचित

प्र + दूषण : प्रदूषण

सत् + संग : सत्संग

सत् + जन : सज्जन

 

फारसी के उपसर्ग भी हिन्दी में बड़ी संख्या में प्रचलन में हैं. जैसे हम, ला, बा, बे इत्यादि। इनके कुछ उदाहरण द्रष्टव्य है

हम + राही : हमराही

ब + कायदा : बाकायदा

ला + जवाब: लाजवाब

बे + बाक : बेबाक

   हिंदी की परंपरा में भाषिक विकास के साथ-साथ कुछ उपसर्ग स्वतः विकसित हुए हैं। इन उपसर्गों में स, अन, पर आदि प्रमुख हैं। इनके उदाहरण इस प्रकार हैं :-

स + पूत : सपूत

अन + जान : अनजान

पर + वर्ती : परवती

पर – देस : परदेस

 

(ख) प्रत्यय या परसर्ग :-

     ये भी शब्दांश हैं पर ये उपसर्ग के विपरीत शब्द के अंत में आकर अर्थ परिवर्तन करते हैं, जैसे- पन > लड़कपन, बचपन इत्यादि। संस्कृत की प्रत्यय परंपरा बहुत समृद्ध है जिसे हिंदी में प्रायः स्वीकार किया गया है। संस्कृत के प्रत्ययों को दो भागों में बाँटा गया है:

(अ) कृदंत

(आ) तद्धित

 

कृदंत : ये वे प्रत्यय है जो किसी क्रिया या धातु के अंत में लगते हैं, जैसे क, एरा, आक इत्यादि। इनके उदाहरण निम्नलिखित हैं –

क : अध्यापक, रक्षक

एरा : लुटेरा

आक : तैराक

आलू : झगड़ालू

 

तद्धित : ये वे प्रत्यय हैं जो क्रियाओं के अतिरिक्त अन्य सभी प्रकार के शब्दों जैसे संज्ञा, विशेषण आदि में जुड़ते हैं. जैसे : पा, मन, आ इत्यादि। इनके कुछ उदाहरण इस प्रकार हैं

पा - बुढ़ापा, बहनापा.

पन : बचपन

आ : प्यासा, निराशा

     हिंदी के अपने प्रत्यय भी काफी मात्रा में हैं। इस संदर्भ में एक विशेष बात यह भी है कि संस्कृत से हिंदी के विकास की प्रक्रिया में जिन क्षेत्रों में सर्वाधिक विकास हुआ है, उनमें से एक क्षेत्र प्रत्ययों का भी है। ऐसे प्रत्ययों में आरी, आहट, अक्कड़ इत्यादि प्रमुख हैं। इनके कुछ उदाहरण इस प्रकार हैं

अक्कड़ : भुलक्कड़, पियक्कड़

आहट : फुसफुसाहट

आरी : पुजारी

 

(ग) संधि और समास :-

      ये भाषा की वे युक्तियाँ हैं जिनमें अलग-अलग शब्द या शब्दांश आपस में जुड़कर एक नए शब्द का निर्माण करते हैं । समास का संयोग दो शब्दों के परस्पर जुड़ने से ही होता है जबकि संधि एक शब्द व दूसरे शब्दांश के बीच भी हो सकती है। अभी तक के उदाहरणों में कई बार संधियों के उदाहरण हमने देखे हैं, जैसे निर् + आकार = निराकार तथा सत् + जन – सज्जन आदि। अब हम समास के संबंध में विशेष चर्चा करेंगे।

  हिंदी में प्रमुख रूप से चार प्रकार के समास स्वीकार किए गए है- अव्ययीभाव, तत्पुरुष, द्वन्द तथा बहुब्रिही समास। इनकी संक्षिप्त व्याख्या इस प्रकार है

1. अव्ययीभाव समासः यह वह समास है जिसमें पूर्व पद प्रधान हो व उत्तर पद गौण हो, जैसे प्रतिदिन।

2. तत्पुरुष समास: यह यह समास है जिसमें उत्तर पद प्रधान हो और पूर्व पद गौण हो जैसे घुड़सवार हस्तलिखित इत्यादि। तत्पुरुष समास के दो उपभेद माने गए हैं- कर्मधारय समास तथा द्विगु समास। ध्यातव्य है कि कुछ तत्पुरुष समास ऐसे भी हो सकते हैं जो इन दोनों में शामिल न होते हों। इन दोनों का संक्षिप्त परिचय इस प्रकार है

  (अ) कर्मधारयः यह समास जिसमें पूर्व पद विशेषण तथा उत्तर पद विशेष्य हो, जैसे : नीलगाय।

  (आ) द्विगुः वह समास जिसमें पूर्व पद कोई संख्या हो तथा वह उत्तर पद की व्याख्या करती हो, जैसे चतुर्भुज, चौराहा, अष्टावक्र, सतसई इत्यादि।

3. द्वंद्व समासः यह वह समास है जिसमें पूर्व पद तथा उत्तर पद बराबर महत्व के हो, जैसे दाल-रोटी, माता-पिता, ज्वार भाटा, हेरा-फेरी इत्यादि।

4. बहुव्रीहि समासः यह वह समास है जिसमें दोनों शब्द मिलकर किसी तीसरे अर्थ की व्यंजना करें। योगरूढ़ शब्द ही, एक प्रकार से बहुब्रीहि समास कहलाते हैं। उदाहरण के तौर पर दशानन शब्द दो शब्दों दश + आनन से मिलकर बना है पर इसका अर्थ ‘रावण’ इन दोनों से भिन्न एक अन्य अर्थ है। ऐसे ही नीलांबर, चक्रपाणि इत्यादि भी इसी समास के उदाहरण हैं।

 

3. पद संरचना :-

     आमतौर पर शब्द व पद को पर्यायवाची माना जाता है पर इनमें एक अंतर है। शब्द स्वयं में स्वतंत्र भी हो सकता है किंतु वही शब्द जब व्याकरण सम्मत नियमों के आधार पर किसी वाक्य में निश्चित स्थान ग्रहण कर लेता है तो पद बन जाता है, जैसे- “राम’, ‘ने’, ‘रावण’, ‘को’, ‘मारा’ ये सभी शब्द हैं कितु “राम ने रावण को मारा’ वाक्य में ये पाँचों पद बन गए हैं। जब तक ये शब्द थे, हम इनका स्थान परिवर्तन कर सकते थे पर अब स्थान परिवर्तन करने से अर्थ के परिवर्तित होने की संभावना हो जाएगी।

 

हिंदी में पदों का वर्गीकरण दो भागों में किया गया है विकारी पद तथा अविकारी पद या अव्यय। यह वर्गीकरण ठौक वही है जो हमने परिवर्तनीयता की दृष्टि से शब्दों के अंतर्गत पढ़ा था। विकारी शब्दों को ही विकारी पद कहा जाता है और अविकारी शब्दों को अविकारी पद।

 

(हिंदी की पद संरचना पूछे जाने पर चार प्रकार के विकारी पदों और चार प्रकार के अविकारी पदों की व्याख्या करें।)

 

 

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1.2 मानक हिंदी की व्याकरणिक संरचना

  किसी भाषा में निहित व्यवस्था उसके व्याकरण पर निर्भर होती है। व्याकरण का अध्ययन चार भागों में बाँटकर किया जा सकता है :- 1. पद संरचना 2. कारक व्यवस्था 3. विकारोत्पादक तत्व 4. वाक्य संरचना   हम क्रमशः इन चारों भागों का अध्ययन करेंगे।   हिंदी की पद संरचना :-       पद संरचना पर आरंभिक चर्चा शब्द संपदा के अंतर्गत की जा चुकी है। शब्द और पद प्रायः समानार्थक शब्द हैं। इनमें अंतर सिर्फ यह है कि व्याकरण की व्यवस्था से युक्त होने के बाद शब्द पद कहलाते हैं।      पहले बताया जा चुका है कि हिंदी के पद दो प्रकार के हैं- विकारी तथा अविकारी। विकारी पदों में संज्ञा , सर्वनाम , विशेषण तथा क्रिया शामिल हैं जबकि अविकारी पदों में क्रियाविशेषण , योजक या समुच्चयबोधक , संबंधबोधक तथा विस्मयादिबोधक पद शामिल हैं। अविकारी पदों के संबंध में जो चर्चा पहले हो चुकी है , वह पर्याप्त है। विकारी पदों के संबंध में यहाँ विस्तृत/चर्चा की जा रही है।   हिंदी की संज्ञा व्यवस्था :- परिचय      संज्ञा वह पद है जो किसी व्यक्ति , वस्तु. विचार भाव , द्रव्य , समूह या जाति के नाम की व्यक्ति करता है। वाक्य